शराब खरीदने वालों के साथ बत्तमीजी क्यूं

अपनी बात शुरू करने से पहले मैं उन सभी मासूम लोगों के प्रति अपनी संवेदना जताता हूं जो लाइन में घंटो खड़े रहे मदिरा का क्रय करने के लिए लेकिन इन ग्राहकों को पुलिस के डंडे ही मिले मदिरा नहीं। लगभग एक‌ महीने से किस तरह से वो लोग बात से खुश हुए थे चलो सरकार ने स्वार्थ के ही खातिर अपना खजाना भरने के लिए ठेकों को खोलने की इजाजत दी। यही नहीं राजस्व बढ़िया मिले इसलिए सुरा की कीमतों में अप्रत्याशित 25 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी भी कर दी। फिर भी इन मासूमों के इरादों पर कोई असर नहीं हुआ और ये लोग लाइन में जा खड़े हुए।

अब मैं अपनी बात रखता हूं, अगर सुरा गलत है तो इसके बेचने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। अगर प्रतिबंध नहीं तो इसे सम्मान का हिस्सा बनाओ, भाई मजाक मत बनाओ उन बेचारों का जो सुरा खरीदते हैं। गाजियाबाद में सबसे ज्यादा मजाक हुआ इन खरीदारों का घंटो लाइन में लगे रहे और ठेके खुले ही नहीं। क्यूं? इंसान के साथ इंसानियत से पेश आना चाहिए। मुझे हर उस व्यक्ति का सम्मान है जो सरकारी राजस्व में अपना योगदान देता है, चाहे वो किसी भी तरह की गई वो खरीद हो जिसका प्रत्यक्ष रूप से असर सरकारी खजाने पर पड़ता है।

मुझे मदिरालय, ठेके व बीयर की दुकान के बाहर खड़े लोगों को देखकर कभी अचंभा नहीं होता क्यूंकि ये ठीक उसी तरह है जैसे हम दूध व सब्जी या फिर दवाई लेने जाते हैं। मेरे एक दोस्त Vikas Yogi जी ने बड़ा अच्छा सुझाव दिया और खुले शब्दों में कहा इसकी होम डिलीवरी की व्यवस्‍था सरकार को करवानी चाहिए। लोगों को मदिरा भी मिल जाएगी व सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन भी नहीं होगा। अगर बेचना अवैध नहीं है तो होम डिलीवरी करवाने में क्या शर्म, खासकरके ऐसे समय जब पूरे देश में कोविड-19 का खतरा मडरा रहा है। इससे सरकारी खजाना भी भरेगा व होम डिलीवरी के रूप में ठेकों को लोगों की जरूरत पड़ेगी जिससे कुछ रोजगार भी पैदा होंगे। फिर अपनी बात दोहराता हूं शराब राजस्व में अपना अहम योगदान देता है इसको इज्जत देनी जरूरी है।

जो पीता है पिएगा जो नहीं पीता वो नहीं पिएगा। चुनने का अधिकार लोगों पर छोड़ दो लेकिन उन लोगों का मजाक मत बनाओ जो पीते हैं। अगर वो न पीते तो आज इन शराब के ठेकों की जगह गाड़ियों के शोरूम व मोबाइल के शोरूम के तरफ सरकार का ध्यान जरूर गया होता।

मुझे बुरा इसलिए लगा क्यूंकि लाइन में खड़े लोगों का न्यूज चैनल वीडियो बना रहे थे लोग टिकटॉक बना रहे थे और ऐसा लग रहा था जैसे ठेकों के बाहर खड़े ये लोग ऐसे अपराधी हैं जिनसे सरकार को राजस्व की उम्मीद है। निर्णायक बनने से पहले सोचो कि गलती जनता की है या फिर सरकार की?

लाइन में लगे लोग हमारे ही भाई बहन हैं जो आज मजबूरी के कारण सरकार को पैसा भी दे रहे हैं और मजाक भी बन रहे हैं। बुरे लोग नहीं होते आपकी सोच होती है, सोच बदलो और पूरी व्यवस्‍था को समझो। शराबी अगर बदनाम होता तो हरिवंश राय की मधुशाला का इतना नाम न होता।

मैं ऐसा समर्थक हूं सुरा का जिसने आजतक अपने अधरों से इसे नहीं लगाया, च्वाइस की बात है।

जय हिंद




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